आओ अथवा बुलाओ....
हम सब गाँव से निकले.. गाँव का घर स्वर्ग लगता था...चार भाई, माँ. पिताजी, दादी, बहनें, बहनोई.....कभी सावन में मिलते थे तो 20-25.... क्या धमाचौकड़ी रहती थी... आज सावन बीत गया .... घर की लड़कियों से कोई यह कहने वाला नहीं हैं कि लाली आजा...
हाँलाकि इस जड़ को काटने में लड़कियों की धूर्तताओं ने भी कम भूमिका नहीं निभाई....वह विषय फिर कभी..
हम सबने वहाँ से निकल कर अपनी अपनी अलग रियासत बनाई..
गाँव का वह घर वीरान हो गया जो पूरे गाँव का सबसे ज्यादा सुख सुविधाओं का घर था..
गाँव का वह घर वीरान हो गया जो पूरे गाँव का सबसे ज्यादा सुख सुविधाओं का घर था..
यह उस दौर की बात है कि हमारे बड़े भैया उस समय हर त्योहार से एक महीने पहले के पोस्टकार्ड
अथवा अंतर्देशी में लिखा करते थे..
आओ अथवा बुलाओ..
दोनों में ही अपना अपना एक ही आनंद था.. अपनों से मिलने का...
जगह कम, सुविधाएं कम, तनख्वाह कम, विस्तर, वर्तन कम... सब कुछ कम.. पर आनंद बहुत अधिक..
आज सब कुछ बहुतायत में हैं पर वे अपने नहीं हैं, जिनमें अपनापन था.. शररीर हैं.. समृद्ध हैं परंतु उनकी संगत में आनंद नहीं हैं...
कुढ़न है, आक्रोश हैं, अफसोस हैं..वस संतुष्टि नहीं है, सुना है चंदन काटने वाली कुल्हाड़ी में भी खुशबू आ जाती हैं.. हम सब में सडांध क्या क्या काटते काटते आ गई..
जीवन इतना बुरा तो कभी नहीं था .. जितना आज हम गा रहे हैं..गाते हैं.. कि उसका कुछ भी अच्छा याद नहीं आता..
फलतः आज प्रतिकार में शब्दों की संवेदना भी सूख गई क्योंकि मैं तो उसे सहज रुप में कहता हूँ .. सामने वाले स्वांग समझते हैं..
तदनुसार..
आज वहां गांव के घर में एक रात काटने की भी सुविधा नहीं है, ...
लगता है हम लोग नियति से बंधे हुए हैं.. हम एक पेड़ की तरह होते हैं..
छोटे होते हैं...कोमल होते हैं.. एक दूसरे को कोई हानि नहीं पहुंचाते..
लाड़ प्यार लालन पालन पोषण करने को माँ बाप होते हैं...दादा दादी होते हैं.
लेकिन यही पौधे..
पेड़ बनते हैं..
एक ही जमीन पर खड़े होते हैं.
जमीन से ही सब जीवन ऊर्जा चूसते हैं..
पर मिलते कभी नहीं..
हां..
तूफान में मिलते हैं...
एक दूसरे से टकराते हैं..
हानि पहुंचाते हैं..
चरचराते हैं... टकराती हैं डालियाँ
तोड़ते हैं एक दूसरे को
अपनी अपनी शक्ति भर..
नहीं पता .. नहीं पता
क्या बीतती है जड़ पर..
हम सोचते तो रहते हैं परंतु क्या सोचते रहते हैं इसकी नहीं पता लगती...
अक्सर मैं अपने आस पास की जिंदगी को बहुत बेहतर बनाने के विषय में सोचता हूँ,....इसलिए बहुत बुरा भला कहता हूँ.. बुरा बनता हूँ.. और हूँ भी बुरा.. यह मुझे पता है.. कहां कहां बुरा हूँ.. पर हूँ तो हूँ.. पर सोचता सब कुछ प्रेममय करने को हूँ.. ..यह मानते हुए कि यदि वे पौधे..इतनी दूरी पर लगाए जाएं...कि किसी भी तूफान में न टकराएं तो क्या यह सोचना माली की मूर्खता है..
या जो अभी भी कुछ विस्थापित किए जा सकते हैं.. उन्हें दूरी पर स्थापित किया जाए... बचपन में शायद इसे थांगी कहते थे.. असकूल के लिए कुछ पौधे हम भी ले के आए थे.... तो टकराहटें कम हो सकती हैं..
और बीच की जगह में क्यारियों में खुशबूदार पौधे हों .. जिनकी सुगंध उपवन में बिखरे .. वे होते हैं हमारे बच्चे...
पर बच्चे... आज कल ज्यादा बड़े हो गए हैं.. यह घर- उपवन का संकट है..
खुद मैं, खुद को, संबंधों को, परिवार को, समाज को, दुनिया को...बहुत ही संजीदगी से संवेदनशील परिवेश
में परिवर्तित करना चाहता हूँ..लगता है जैसे सारी क्रांति मैं कर लूंगा... परंतु..किंतु, कदाचित,...
यह परंतु महाभारत काल से आज तक अपने बहुत तीखे और पैने दांत नाखूनों के साथ जिंदा है तभी तो...
क्रान्ति के दावों में क्यों होती है कमज़ोरी की गंध,
क्रान्ति की हर चेतना सीमित है क्यों ललकार तक...
शैलेश ज़ैदी की ये पंक्तियाँ पता नहीं मुझे क्यों बहुत अच्छी लगती हैं...
शायद अपने निजी जीवन, परिवार, प्रदेश और फिर देश के साथ जिए हुए जीवन को देखता हूँ तो बहुत से क्रांतिकारी , परिवारी, मित्र, खुद मैं और अपना, सबका खोखलापन ज्यादा नजदीक से महसूस करने लगता हूँ...
क्योंकि मैं खुद के और उन ढो़ंगी महात्माओं के बहुत नजदीक रहा हूँ,, जितना पास गया, अपना और उनका .. दोनों का ही खोखलापन दिखा, समझ में आता गया, शायद दुनियावी ताल्लुकों की तरह दूर रहता तो मान सम्मान दुआ सलाम ताल्लुक बना रहता ...
.इस खींचातानी में जड़ भी सूख गई.तो अशोक वाजपेयी जी धीरे से बोले..
इधर-उधर भटकने-खोजने से क्या होगा?
अपनी जड़ों पर जमकर रहो,
वहीं रस खींचो,
वहीं आएंगे फूल, फल पक्षी,
धूप और ओस,
वहीं आकाश झुकेगा-
वहीं पृथ्वी करेगी पूतस्पर्श-
वहीं जहां जड़ें हैं
और उन पर जमे तुम हो,
वहीं
अपनी जड़ों पर जमकर रहो,
वहीं रस खींचो,
वहीं आएंगे फूल, फल पक्षी,
धूप और ओस,
वहीं आकाश झुकेगा-
वहीं पृथ्वी करेगी पूतस्पर्श-
वहीं जहां जड़ें हैं
और उन पर जमे तुम हो,
वहीं
लगा कि कह रहे हैं कि तुम ही जड़ों को सींच लो .. दूसरों को क्या दोष दे रहे हो..फिर लगा कि जड़ों को सींच कर रखने की जिम्मेदारी वाले बागवाँ अपने-अपने अलग कुल्ले लगा कर अपने पेड़ तैयार कर रहे हैं और जड़ परिवर्तन के युग में हैं.. कल को तुम भी अपनी जड़ अलग करोगे तो देखोगे.. तुम भी अपने पीछे वालों के साथ.ही अपना अस्तित्व खोजोगे.... न कि अपने मूल वृक्ष के साथ....
चकरघिन्ना गया..
लगा कि सागर की तरह शांत होने की कोशिश करनी ही होगी..
कुमार भैया कह रहे थे एक दिन..
यह उथला सागर क्या जाने
हम कितने गहरे हैं.
परंतु यहां भी एक फालतू का परंतु तैयार था...जैसे वाट्सअप समूह मे ंअगला बेहूदा वीडोयात्मक नकली हँसी घुसेड़ा हुआ चुटुकला...
हमने समन्दरों को नहीं देखा गौर से.
वो भी गुज़र रहे हैं मुसीबत के दौर से...
वो भी गुज़र रहे हैं मुसीबत के दौर से...
लो कहां घिरे..
यह भी जीवन की एक सच्चाई है कि बहु बड़े लोग भी बहुत बड़ी मुसीबतों से गुजर रहे होते हैं... जैसे समंदर...कितनी बड़ी उपेक्षा झेलते हैं कि महासागर हैं किंतु उनके पानी की एक बूंद भी किसी की प्यास नहीं बुझा पाती...फिर वे कहते हैं कि -
मीठा भी और खारा भी पानी का है स्वभाव,
सुनता हूँ मैं समुद्र में हैं दोनों धारे साथ.
सुनता हूँ मैं समुद्र में हैं दोनों धारे साथ.
जीवन पथ पर चलते चलते भाई, बहन, मित्र, गुरु, कहीं न कहीं छूटते जाते हैं...
तब शैलेश ज़ैदी कहते हैं कि-
याद आता है भंवर में कई लोग थे घिरे,
लेकिन पहुँच न पाया कोई भी किनारे साथ....
लेकिन पहुँच न पाया कोई भी किनारे साथ....
बहुत से तो टूट जाते हैं, डूब जाते हैं, कुछ किनारे भी पहुंचते हैं,
फिर एक और मनहूस.. परंतु...कराह उठा...जैसे निकरौसी के शुभ अवसर पर विधवा बुआ के दर्शन हो गए हों..
किनारे पहुंचने वाले भी पहुंचते तो साथ साथ हैं पर किनारों पर कहीं अलग-अलग घाटों पर पहुंचते हैं.....
यानी कि ज्ञान उतरा..कि मंजिलें सब की अलग थीं..इसलिए घवराकर अपने अपने ठिकाने लग गए..
अब काम कुछ है नहीं.. जो करूं...तो सोचने लगा...जो भँवर में साथ थे उनके किनारे क्यों अलग हो जाते हैं..घर परिवार की इन गुत्थियों को सुलझाते सुलझाते ही बकर-बकर करने का उस्ताद हो गया...न साहित्यकार, न कवि, न लेखक, ..आपको क्या लगता है......
जो आपको लगता हो ...
वो आपकी समस्या है.... मुझे भी मन की बात कहने का पैतृक अधिकार है.. जो साँची कहते थे.. और मेरी दादी तो ऐसी साँची कहती थी कि सुनकर मरने-मारने पर उतारु हो जाए.. मेरी दादी का काटा पानी नहीं मांगता था.. पर आज... मुझे तो यह लगता है कि साँची बात कहने लिखने वाले बहुत कम हैं..नहीं तो पढ़के देख लो ..मेरे साहित्यिक कुनबे के बड़े भाई अशोक रावत जी को..
चक्षु खुल जाएंगे...
पीर कम हो जाएगी..
लगेगा कि ज़र्राह ने दुखते फोड़े की पीली नाक चीर दी है...
पीर में आँसू कैसे हँसते हैं, कभी देखे हों तो याद आ जाएंगे.. नाक भी बहती हैं, चेहरा सुर्ख होता है,
टांगें कांप रही होती हैं, शरीर में एक अलग ही आनंद लहर होती हैं..आप अपना खून मवाद बहता देख रहे होते हैं..
पर आनंद से.. .. उसी भाव से पढि़ए......
कैसे कैसे सवाल देता है,
वक़्त मुश्किल में डाल देता है.
मेरे हक़ का सवाल आता है जब,
वो मुक़द्दर पे टाल देता है,
ये ज़माना है मुजरिमों का ही,
क्यों लहू को उबाल देता है.
पत्थरों का बुलंद हो जाना,
आइनों को मलाल देता है.
टूट जाता है हर नियम पल में,
जब कमीशन दलाल देता है.
तेरा सीने से लग के खो जाना,
मेरे आँसू निकाल देता है.
पहली पहली निगाह का मिलना,
कैसे कैसे ख़याल देता है..
चलिए .. फिर मिलेंगे..
जय हिंद
जय हिंदी