(बचपन से पचपन का एक अंश)
चलते चलते जिंदगी अचानक हमें किस मोड़ पर ले आती है कि नहीं समझ पाते कि यहां कैसे पहुंच गए जब कि यहां के लिए निकले तो नहीं थे। परिवार के जीवन काल में ऐसा अवश्य होता है और हर परिवार के साथ होता है यानी कि परिवार के हर व्यक्ति, घटक के साथ ऐसा अवश्य ही होता है। अब इसमें सबसे मजेदार बात यह है कि ऐसी परिस्थिति में हम सब दोष दूसरों को देते हैं। यद्यपि मैं इसे मजेदार इन अर्थों में नहीं कह रहा हूँ कि इस परिस्थिति में किसी को भी आनंद आता होगा या इसमें कोई गहरी संतोष की अनुभूति होगी। ऐसा नहीं है। ऐसी परिस्थितियाँ किसी के लिए भी सुखद नहीं होती, जिसमें हर कोई खिंचा हुआ, तनाव में, अलगाव में होता है और किसी से भी पूछ के देखो वह दूसरे के विरुद्ध भरा हुआ मिलेगा, आप ने जरा सा छेड़ा नहीं और वह फटा नहीं। फटने से याद आया कि होली आने वाली है और गुब्बारे बहुत फटते हैं, फूटते हैं। अपने मन की उलझी उलझी बातों के गुबारों को सुलझाते सुलझाते अचानक ही यह गुब्बारे का रूपक दिमाग में चढ़ गया कि इसका नाम गुब्बारा कहां से पड़ा होगा, तो समझ में आया कि यह गुब्बारा कहीं न कहीं मन के गुबार से निकला होगा। दोनों के क्षणभंगुर जीवन में कई साम्य हैं। गुबार जब निकलते हैं तो पिचका हुआ दिल दिमाग फूलने लगते हैं, ऐसे ही जब गुब्बारा हवा को झेलता है, तो फूलता चलता है। अब गुब्बारा फूटा तो जरुरी नहीं है कि इसका कारण यह हो कि किसी ने सुई की नोंक चुभोई हो .. गुब्बारा हवा भरने वाले गैर अनुभवी होठों के अंसतोषी उतावले पन से भी फूट सकता है कि वह सही समय पर न पहचान पाएं कि कहां हवा भरने से रुकना है, भरते रहते हैं.... और और और ...
तब याद आते हेैं धर्मवीर भारती...
और और की धुन है केवल
तृप्ति प्रलय पर्यंत नहीं है।
जुबैर अली ताबिश जी ने भी क्या मौंजू बात कही है--
तुम्हारा सिर्फ़ हवाओं पे शक गया होगा
चराग़ ख़ुद भी तो जल जल के थक गया होगा
मन के गुबार के ऊपर भी यही बातें लागू की जा सकती हैं कि यह जरुरी नहीं है कि किसी और के उकसाने पर ही फूटें या आपके कष्ट का कारण परिवार के दूसरे सह यात्री ही हों । हो सकता है आप स्वयं ही इतने कमजोर हैं कि आप अपने ही मन को न संभाल पा रहे हों। उसमें इतनी निर्रथक विचार कबाड़ की फैक्टरी चला रहे हों कि उसकी दिशा हीन अनियंत्रित ऊर्जा ही आपके मन कोटर से निकलने को उतावली हो, जो कहीं से भी बस फटकर ही निकल सकती है।
परिवार में एक और बात समझ में आती है जो किसी अध्यात्मिक गुरु के संदेश से समझ में आई। वे कह रहे थे कि जैसे आप कहीं खड़े हैं और आपके हाथ में पानी का ग्लास है। कोई अचानक से आया और आपसे टकरा गया और आपके हाथ से ग्लास छलका और पानी गिर गया। ठीक है टकराना एक घटना है किंतु गौर करने लायक बात यह है कि वही छलका जिससे ग्लास भरा हुआ था। यानी कि अगर ग्लास में दूध या अन्य कोई भी द्रव होता वही छलकता। ऐसे टकराव की स्थिति में परिवार के प्रत्येक सदस्य अपने हाथ में जिस चीज से भरा ग्लास लेकर खड़ा होता है, वही छलकता है। माँ होती है तो वह सबके लिए रोती है दुखी होती है, पिता होते हैं तो वे सबके लिए परेशान होते हैं कि मैंने इस दिन के लिए परिवार बनाया था। पत्नी और बच्चे कुछ सुखी, कुछ दुखी होते हैं। सुखी इस आशा में कि क्लेश कट रही है शायद अब सुख आएगा और दुखी इसलिए कि परिवार नामक संस्था के सुख से कहीं न कहीं तो बंचित होंगे ही। उनके घर में मां बाप में झगड़े का कारण यह परिवार ही था और अब ये क्लेश मिटेगी।
परिवार में कभी जिनके बहुत साथ होते थे जिनके बिना लगता नहीं था कि अपना या परिवार का कोई अस्तित्व है या यों कहिए कि उनके साथ होने से ही लगता था कि हम परिवार में हैं ये हमारे परिवारी जन हैं, एक दिन कभी ऐसा भी आ जाता है कि उन आदमियों की परछाई आने पर भी लगता है कि ये हमारे परिवार में क्यों घुसा चला आ रहा है। सबसे दुर्भाग्यशाली पल वे होते हैं कि हमें वे लोग बददुआएं देने लगते हैं जो हमारी दो चार छीकों पर नजर उतारने चलते थे और पथवारी पर दुआएँ मांगने जाते थे। बचपन के वे खिलोंने, सब पिल्ले गुर्राने वाले कुत्ते ही क्यों बनते हैं। हम से कहां चूक होती है बचपन से पचपन तक..
बचपन से लेकर आज पचपन में इन परिस्थितियों को बाल मन की नींव पर खड़ी खण्डहर विचारों से निर्मित प्रौढ़ खोपड़ी तक की यात्रा में देखता हूँ कि ऐसा क्या खोया, क्या पाया जिसे मैं प्रगति कह सकूं। बल्कि घाव सा लगता है कुछ लोगों को बचपन के खपरैल वाले घरों में छप्पर के नीचे एक खाट पर पाँच छह को गुत्थमगुत्था सोते हुए देखकर जिसमे किसी बड़े या बड़ी का हाथ उनींदा होते हुए भी छोटों पर बीजना झलता होता था.... या आज कुछ लोगों के फ्लैट के ड्राइंग रुम में अपने आपको देखकर कि..
रहते थे कभी जिनके दिल में
हम प्राण से भी प्यारों की तरह
बैठे हैं आज उन्हीं के कूचे में
हम गुनहगारों की तरह...
https://www.youtube.com/watch?v=x2plQQ80x3k
(फिल्म ममता,1966)